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Prabhu Ji's answers to questions asked by his followers

प्रश्नकर्ता - प्रभुजी, चित्त बड़ा अशांत रहता है, बड़ी बैचेनी मालूम पड़ती है, समझ में नहीं आता की इस अशांति को दूर कैसे करें, प्रभुजी शांत कैसे हुआ जाये ?

प्रभुजी द्वारा – शांति हमारा असली स्वभाव है जो अशांति के विपरीत चेष्टा करके नहीं लाई गई है बल्कि शांति और अशांति दोनों को समझा, न शांति से राग बनाया न अशांति से द्वेष जगाया बस इन दोनों को मन का खेल जानकर समझा। जब हम इस खेल को समझते हैं तब हम भीतर शांत होते हैं और वह शांति हमारे स्वभाव की है, वह शांति अखंड है। हम उस शांति को देखते है जो क्षणिक रूप से आयी, इसे जाने की यह अनित्य है। अशांति आयी, इसे भी जाने की यह अनित्य है यह भी जाएगी। शांति गई, अशांति गई इन दोनों के पीछे हम जानते है कि नित्य यहाँ कुछ भी नहीं हैं सब अनित्य हैं, हर चीज बह रही है, आती है और जाती है। तो शांति को अगर “मैं” बनाए रखने की कोशिश करता हूं तो मैं गलत चेष्टा कर रहा हूँ या मैं अशांति को हटाने की चेष्टा कर रहा हूँ तब भी गलत चेष्टा कर रहा हूं क्योंकि वह अपने स्वभाव से आएगी और अपने स्वभाव से जायेगी। शांति अपने स्वभाव से आयेगी और जायेगी भी अपने स्वभाव से। अशांति आयी, अपने स्वभाव से आयी और अपने ही स्वभाव से चली जायेगी। मैं इसे हटाने वाला कौन होता हूँ? और जब हम ऐसा देखते हैं की अशांति अपने स्वभाव से आयी तो चली भी जाएगी, अनित्य है। यह है तो भी ठीक, जा रही है तब भी ठीक। तब जो पीछे शांति होती है वह अक्षुण्ण होती हैं, अखंड़ होती है। ऐसी शांति बाधित नहीं होती किसी भी परिस्थिति से, क्योंकि वह किसी परिस्थिति या किसी कारण से पैदा नहीं हुई है, वह तो अकारण है, और जो शांति अकारण होती है वही हमारा वास्तविक स्वभाव है। कारण से लायी गई सब चीजें कारण के विदा होने पर ही विदा हो जाती है। तो मन कई चीजों को पैदा करता है, पर देखो मन को, कहाँ भाग रहा है? कैसे भाग रहा है? क्योंकि भागकर भी हम सच्चाई से मुक्त तो हो नहीं सकते। यदि हम प्रसन्न नहीं है तो यह बात तो साफ हो जाती है कि हमे अपने आप पर काम करना पड़ेगा। हम प्रसन्न नहीं हैं इसका पता हमें तब ही चलता है जब हम अपने आप को अव्यस्त छोड़ते हैं। अव्यस्त स्थिति में जब कुछ भी करने को नहीं हो तब भी तुम प्रसन्न हो, तब तुम सही रास्ते पर हो।

प्रभुजी द्वारा – जैसे कि मैंने कल कहा कि मैंने अकेलेपन को उसके शिखर तक छुआ और जब से मैंने उसे देखा तब से कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ी, TV, Mobile, किताबे सब हैं पर अब उनको खोलने की जरूरत नहीं पड़ती। यदि कोई आ गया तो मिल लेता हूँ नहीं तो बैठा रहता हूँ। अपने से भागने का अब कोई कारण नहीं बचा। भाग रहा था बहुत पर जब से अकेलेपन को पूरा-पूरा देखा तब से अकेलापन विदा हो गया। अब अकेले होकर भी सब के साथ होने की प्रतीति होती हैं। हम अपने को इतना पूर्ण महसूस करते हैं जैसे कि हम पूरा का पूरा बह्मांड हैं। जब हम भीतर देखते हैं कि अकेलेपन में खुश नहीं है तब हमें अपने पर काम करना चाहिए। यह आवश्यक है कि खुद पर काम करें। क्योंकि कोई कारण नहीं हैं कि हम स्वयं के साथ खुश नहीं है। ऐसा भला क्यूँ होना चाहिए कि हम स्वयं के साथ खुश नहीं है? ऐसा क्यूँ हैं कि हम सतत् भागते हैं? इसको जानने के लिए हमें खोज करनी होगी की ऐसा क्यूँ हैं। कोई जद्दोजहद नहीं करना है बस सिंपल खोज की, हमें जानना हैं कि ऐसा होता क्यूँ है? ध्यान कर रहें हैं मन नहीं लग रहा, मन भाग रहा हैं, हमे जानना हैं मन के इस भागने को, हमें ध्यान लगाना ही कहाँ हैं हमें तो बस जानना हैं मन के इस ढंग को। कहीं से अपने को हटा के कहीं और केंद्रित थोड़ी न करना है। बस हमें मन के इस ढंग को समझना है कैसे यह किसी चीज को पसंद कर रहा है और कैसे किसी चीज को नापसंद कर रहा हैं। जब हम अपने आप को स्पेशल ट्रीटमेंट देना बंद कर देते हैं। थोड़ा समझना इसको स्पेशल ट्रीटमेंट से मतलब किसी भी तरीके से हम अपने “मैं” को किसी विशेषण में न रखें की मैं समझदार हूँ, मैं बुद्धिमान हूँ, मैं ज्ञानी हूँ, मैं प्रतिष्ठित हूँ, मैं ध्यानी हूँ, मैं योगी हूँ, मैं ज्ञानी हूँ। हम इस तरीके के किसी भी विशेषण में अपने को नहीं रखते हैं, “मैं” को नहीं रखते हैं बल्कि हम अपने भीतर अपने आप को इन विशेषणों से मुक्त करके देखें। तो हम जानकर आश्चर्यचकित होंगे कि भीतर बकबक बन्द हो गई। चुपचाप हो गए। अब कोई भीतर बोल नहीं हैं क्योंकि हमने अपनेआप को सारे विशेषणों से मुक्त कर लिया है। कुछ भी जैसा भी हूं, बस ऐसा ही हूँ अज्ञानी हूँ, मूढ़ हूँ, अशक्त हूँ, जो भी हैं जैसा भी हैं उसमें बने रहें और तुम पाओगे की इसके साथ मौन आ गया। इस प्रयोग से अपने पर काम करना आसान हो जाता हैं। मन को बस देखते रहना है उसकी पसंद-नापसंद, सहीं-गलत, एक चीज से छूटता नहीं कि दूसरी को पकड़ लेता हैं। यहीं चीजे हमें परेशान करती हैं कि हम चीजों को पकड़े रहना चाहते हैं, और अगर पकड़े रहेंगे तो उसको खोने का भय आएगा, इसके विपरीत जो चीजे सामने आएगी वो तुम्हे व्याकुल करेगी। तो भय और चिंताएँ रहेगी जैसे ध्यान में थोड़ी देर के लिए शांति मिली, अब हम चाहेंगे कि वह शान्ति बनी रहे, अब इस शांति को खोने का भय। पर अब हम इसे उसके स्वभाव में देखें कि शांति आई यह भी ठीक, शांति गई यह भी ठीक। अशांति आई इसे भी स्वीकार करे, लड़ें मत। तो जब हम हमारे मन का सारा जाल देखने लगते हैं कल्पनाओं का, सपनो का, बकबक का तो धीरे-धीरे हम इसके स्वभाव को समझने लगते हैं। बहुत तकलीफ होगी मन छटपटाएगा, जब आप मन के अनुसार नहीं चलोगे, पर इस तकलीफ को भी स्वीकार करें, इस छटपटाहट को भी स्वीकार करें। बस आपको जागकरूक होना है जैसा भी हैं बस हैं। उसे हटाने की कोशिश न करें। ऐसा कोई भी कारण नहीं है जिसके लिए हम आनंदित न हो, हम अपने आप से पूछे की मेरा आनंदित न होने का कारण क्या हैं? क्यूँ में सतत् खुशी का, आनंद का कारण ढूंढ़ रहा हूँ? चाहे वह दूसरों में ढूंढ़ रहा हूँ, पर क्यूँ? ऐसा क्यों हैं कि मेरा अकेलापन ही मुझे काटता हैं? प्रकृति में ऐसा कोई भी नहीं है, पर बस हम ही ऐसे क्यूँ हैं, पेड़ों में, पशु-पक्षियों में ऐसा कुछ नहीं हैं? पर हमें आनंद के लिए, सुख के लिए सतत दूसरों की तलाश क्यूँ रहती हैं? हमें इन्हीं प्रश्नों पर गौर करना हैं। इसे देखने की कोशिश करें कि क्यूँ हम सारे कार्यों के साथ खुश नहीं हो सकते? और यहीं बात हमारे भीतर समझ मे उतरेगी। यह कोई ऐसा नहीं हैं कि मैं आपको बोल दूँगा और आपको समझ में आ जाएगी। धीरे-धीरे जब हम इस सारे खेल को देखते जाएंगे तो एक बात समझ जाएंगे की यहाँ कोई कारण नहीं है और पहले भी नहीं था कि मैं आनंदित क्यूँ नहीं हूँ। आनंद तो था और हैं बस समस्या यह थी कि मैं चीजों के साथ पसंद नापसंद में लग गया था, उन्हें पकड़ने में लग गया था। मैंने यहाँ अपने आप को किन्ही विशेष चीजों से जोड़ा था और कुछ से हटाया था। पर जब तुम समझने लगते हो, इस प्रयोग से गुजरते हो तब एक गजब घटना घटती हैं कि यहाँ हमारे “मैं” के लिए यहाँ जगह नहीं हैं। तुम रिलेक्स होते हो कोई आग्रह नहीं होता कि यह हो या वह हो, शांति हैं तो ठीक अशांति हैं तो भी ठीक। शांति को बनाए रखने की भी जिद नहीं और अशांति को हटाने की भी कोई चेष्टा नहीं हैं। एक खेल सतत् भीतर चल रहा है एक विचार गया नहीं कि तत्काल उसकी जगह दूसरा आ गया। फिर तुरंत तीसरा आ गया, एक भाव उठा भी नहीं और दूसरा आया; तुरंत तीसरा आ गया। तो यह सारा खेल सतत् भीतर चल रहा हैं। यहाँ क्या किसी के साथ राग जगाना और क्या किसी की साथ द्वेष जगाना। बदलने की मूढ़ता में ना फँसे, बस जाने की ऐसा हैं। मन के खेल को समझे और बस मुस्कुराएं। जो कुछ भी हैं उसे स्वीकार करें चाहे अच्छा है या बुरा, चाहे सहीं है या गलत। यह सहज स्वीकार का प्रयोग आपको मन का सारा खेल जानने में मदद करेगा और आप अपने आप को धीरे-धीरे मौन की अवस्था में पाएंगे।